लाल रंग के नीचे नहीं छिपा सांसद का नाम, रेलवे निर्माण में सरकारी टैंकर

तपस गुप्ता

Reporter | Updated: 11 Oct 2026, 02:35 PM IST | 1 min read
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उमरिया तपस गुप्ता (7999276090)

कहते हैं कि दीवारों पर रंग चढ़ाकर पहचान छिपाई जा सकती है, लेकिन पुराने निशान कई बार पूरी कहानी बयां कर देते हैं। कुछ ऐसा ही मामला बिरसिंहपुर पाली नगर के पुराने बस स्टैंड क्षेत्र में सामने आया है, जहां रेलवे के ड्रेन और ब्रिक्स वॉल निर्माण कार्य में इस्तेमाल हो रहे पानी के टैंकर पर लाल रंग का पेंट तो चढ़ा दिया गया, लेकिन उस पर लिखा तत्कालीन शहडोल सांसद दलपत सिंह परस्ते का नाम अब भी साफ दिखाई दे रहा है। टैंकर को देखकर सवाल उठ रहा है कि आखिर ग्रामीणों की सुविधा के लिए उपलब्ध कराया गया संसाधन रेलवे के निर्माण कार्य में कैसे पहुंच गया।

बताया जा रहा है कि यह टैंकर तत्कालीन सांसद दलपत सिंह परस्ते द्वारा ग्राम पंचायत को उपलब्ध कराया गया था। इसका उद्देश्य ग्रामीणों को पानी की जरूरत के समय सुविधा देना था। शादी-विवाह और अन्य सामाजिक आयोजनों के साथ पेयजल की आवश्यकता पड़ने पर ऐसे टैंकर ग्रामीणों के लिए उपयोगी साबित होते हैं। लेकिन पाली में सामने आए इस मामले में टैंकर का उपयोग निर्माण कार्य में होता दिखाई दे रहा है।

रंग बदलने की कोशिश, पहचान फिर भी बरकरार

टैंकर पर लाल रंग का पेंट किए जाने के बावजूद सांसद का नाम स्पष्ट नजर आना मामले को और दिलचस्प बना रहा है। सवाल यह है कि यदि टैंकर सामान्य रूप से किराये पर लिया गया है, तो उसके पुराने सरकारी पहचान चिह्न को ढकने के लिए पेंट क्यों किया गया। क्या टैंकर की पहचान छिपाने का प्रयास किया गया या इसके पीछे कोई दूसरा कारण है। इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकेगा।

हालांकि, केवल लाल रंग का पेंट चढ़ा होने से यह साबित नहीं होता कि पहचान जानबूझकर मिटाने की कोशिश की गई। लेकिन सांसद का नाम दिखाई देने के कारण टैंकर के स्वामित्व और उसके इस्तेमाल की परिस्थितियों की जांच जरूरी हो गई है।

ओम कंस्ट्रक्शन का साइट इंचार्ज बोला, हमें कुछ नहीं पता

इस संबंध में रेलवे निर्माण कार्य करा रहे ठेकेदार ओम कंस्ट्रक्शन के साइट इंचार्ज सुनील वेजय से बात की गई। उन्होंने कहा कि उन्हें टैंकर के बारे में कुछ जानकारी नहीं है और वे इसे किराये पर लेकर आए हैं यादव जी से। उनके इस बयान के बाद अब सवाल उठता है कि टैंकर किस यादव जी से किराये पर लिया गया, उसका वास्तविक मालिक कौन है और क्या उसे निर्माण कार्य में इस्तेमाल करने की अनुमति है।

ग्रामीणों की सुविधा का टैंकर, इस्तेमाल कहीं और

यदि टैंकर ग्राम पंचायत को दिया गया था, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह पंचायत के रिकॉर्ड में दर्ज है या नहीं। यदि वह शासकीय संपत्ति है, तो उसे निजी निर्माण कार्य में किराये पर चलाने की अनुमति किसने दी।क्या पंचायत के जिम्मेदारों को इसकी जानकारी है। इन सवालों पर संबंधित अधिकारियों की चुप्पी के बजाय स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।

फिलहाल, टैंकर की वास्तविक स्थिति और उसके उपयोग को लेकर आधिकारिक जांच की जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में संबंधित पंचायत और प्रशासन को टैंकर के स्वामित्व, किराये पर दिए जाने तथा निर्माण कार्य में उसके इस्तेमाल की जांच करनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ग्रामीणों की सुविधा के लिए उपलब्ध कराया गया संसाधन आखिर किसके उपयोग में है।