उमरिया तपस गुप्ता (7999276090)
नाम बाबा महाकाल और काम को लेकर उठते गंभीर सवाल उमरिया जिले में रेत ठेका कंपनी बाबा महाकाल से जुड़े कर्मचारियों का विवाद अब चर्चा का विषय बन गया है। कोतवाली थाना क्षेत्र के चपहा में रेत परिवहन को लेकर हुए विवाद का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में कुछ लोग हाथों में डंडे लेकर विवाद करते दिखाई दे रहे हैं। इस घटनाक्रम ने जिले में रेत कारोबार की निगरानी, कंपनी के कर्मचारियों की भूमिका और जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या रेत परिवहन की निगरानी के नाम पर कोई भी कंपनी अपनी अलग व्यवस्था खड़ी कर सकती है। क्या उसके कर्मचारी खुद ही विवाद का हिस्सा बनेंगे और फिर भी व्यवस्था पर सवाल नहीं उठेंगे। जिला मुख्यालय के नजदीक चपहा में सामने आया यह मामला प्रशासनिक निगरानी की हकीकत पर सवाल खड़ा कर रहा है।
डंडे लेकर विवाद, कानून का डर कहां
जानकारी के अनुसार, बुधवार सुबह करीब आठ बजे चपहा में रेत परिवहन को लेकर विवाद हुआ। वायरल वीडियो में कुछ लोग हाथों में डंडे लेकर बहस और विवाद करते नजर आते हैं। वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इसमें दिखाई दे रहे लोगों की भूमिका और विवाद की पूरी परिस्थितियों की जांच जरूरी है।
लेकिन इतना जरूर है कि यदि रेत परिवहन को लेकर विवाद की स्थिति बनती है, तो उसका निपटारा कानून के दायरे में होना चाहिए। किसी भी कंपनी के कर्मचारी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। यदि वीडियो में दिखाई दे रही गतिविधियों में मारपीट, धमकी या किसी अन्य अपराध की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
चौकी का पंजीयन नहीं, फिर किस आधार पर चल रही व्यवस्था
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू चपहा में कंपनी द्वारा बनाई गई कथित निगरानी चौकी है। कोतवाली थाना प्रभारी मदनलाल मरावी के अनुसार, रेत परिवहन को लेकर दोनों पक्षों की शिकायतें मिली हैं और जांच जारी है। उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी की ओर से बनाई गई निगरानी चौकी का सरकारी कागजों में पंजीयन नहीं है।
यह जानकारी कई सवाल खड़े करती है। यदि चौकी का पंजीयन नहीं है, तो उसकी वैधानिक स्थिति क्या है। वहां बैठने वाले कर्मचारियों को क्या अधिकार प्राप्त हैं। क्या वे केवल परिवहन पर नजर रखने के लिए तैनात हैं या वाहनों को रोकने और उनसे पूछताछ करने जैसी गतिविधियां भी करते हैं।इन सवालों का जवाब कंपनी और संबंधित विभाग को देना चाहिए।
जब चौकी की वैधानिक स्थिति पर ही सवाल है, तो उसकी निगरानी और संचालन की जिम्मेदारी किसकी है।
जिला खनिज अधिकारी की जवाबदेही कहां
रेत का कारोबार खनिज विभाग की निगरानी और निर्धारित नियमों के तहत संचालित होना चाहिए। ऐसे में जिला मुख्यालय के नजदीक कंपनी की कथित निगरानी चौकी के पंजीयन पर सवाल उठना जिला खनिज अधिकारी की जिम्मेदारी को भी सामने लाता है।
क्या खनिज विभाग को इस चौकी की जानकारी थी। क्या विभाग ने मौके पर जाकर जांच की। क्या कंपनी को ऐसी व्यवस्था संचालित करने की अनुमति है। यदि अनुमति है, तो उसकी शर्तें क्या हैं।और यदि अनुमति नहीं है, तो अब तक क्या कार्रवाई की गई।
इन सवालों पर विभाग की चुप्पी या जवाब देने में देरी जनता के संदेह को और बढ़ा सकती है। खनिज विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि कंपनी की निगरानी व्यवस्था किन नियमों के तहत संचालित हो रही है। केवल ठेका दे देना विभाग की जिम्मेदारी का अंत नहीं हो सकता। ठेकेदार और उससे जुड़े कर्मचारियों की गतिविधियों पर निगरानी रखना भी प्रशासनिक जवाबदेही का हिस्सा है।
मुख्यालय के पास यह हाल, दूरस्थ इलाकों में कौन देखेगा
जब जिला मुख्यालय के आसपास ही रेत परिवहन को लेकर विवाद और कथित अपंजीकृत निगरानी चौकी का मामला सामने आ रहा है, तो दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में निगरानी की स्थिति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। वहां यदि ग्रामीणों और कंपनी के कर्मचारियों के बीच विवाद होता है, तो उनकी शिकायत कौन सुनेगा और मौके पर कार्रवाई कौन सुनिश्चित करेगा।
रेत परिवहन व्यवस्था का उद्देश्य नियमों के तहत कारोबार सुनिश्चित करना है, न कि ऐसी स्थिति पैदा करना जिसमें कंपनी के कर्मचारियों और आम लोगों के बीच टकराव हो। यदि किसी पक्ष ने नियम तोड़े हैं, तो कार्रवाई साक्ष्यों और कानून के आधार पर होनी चाहिए।
अब पुलिस और खनिज विभाग को देना होगा जवाब
फिलहाल पुलिस के अनुसार, दोनों पक्षों की शिकायतों की जांच जारी है। ऐसे में जांच में वायरल वीडियो, कथित निगरानी चौकी की स्थिति और विवाद में शामिल लोगों की भूमिका को स्पष्ट करना जरूरी है। दूसरी ओर, जिला खनिज अधिकारी को भी चौकी के पंजीयन और कंपनी की निगरानी व्यवस्था पर अपना पक्ष सामने रखना चाहिए।



