अकाल में जनता को राहत, शिक्षा को बढ़ावा और बाघों के शिकार पर रोक! रीवा के महाराजा वेंकटरमण सिंह की कहानी के कई पहलू आज भी हैं अनसुने
1895 में मिलीं प्रशासनिक शक्तियां, अकाल राहत नीति के लिए मिली ब्रिटिश सम्मान की उपाधि; सरस्वती भंडार पुस्तकालय और दरबार प्रेस भी उनके शासनकाल की खास पहचान
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रीवा। विंध्य की धरती का इतिहास राजमहलों, शौर्य और प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ ऐसे शासकों की कहानियों को भी समेटे हुए है, जिनके शासनकाल में जनकल्याण और प्रशासनिक बदलावों की पहल हुई। रीवा रियासत के महाराजा वेंकटरमण सिंह जूदेव ऐसी ही ऐतिहासिक शख्सियत थे। उनके जीवन से जुड़े कुछ तथ्य आज भी आम लोगों के बीच कम चर्चा में आते हैं।
महाराजा वेंकटरमण सिंह का जन्म 1876 में हुआ था। वे महाराजा रघुराज सिंह के पुत्र थे। रीवा रियासत की सत्ता से उनका संबंध बचपन में ही जुड़ गया था, लेकिन उन्हें पूर्ण प्रशासनिक अधिकार वर्ष 1895 में मिले। उनके शासनकाल में राज्य को भीषण अकाल का सामना करना पड़ा। ऐतिहासिक विवरणों में उनकी अकाल राहत नीति की विशेष चर्चा मिलती है।
अकाल के समय राहत बनी पहचान
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अकाल ने रीवा रियासत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन को प्रभावित किया। ऐसे समय में अकाल राहत के लिए संसाधन जुटाना और पीड़ितों की मदद करना बड़ी चुनौती थी। महाराजा की राहत नीति की प्रशंसा तत्कालीन ऐतिहासिक विवरणों में दर्ज है। वर्ष 1897 में उन्हें ब्रिटिश शासन की ओर से जीसीएसआई सम्मान दिए जाने का उल्लेख भी मिलता है। उस समय के विवरण में अकाल के दौरान उनकी उदारता और दूरदर्शिता की सराहना की गई थी।
रीवा का ऐतिहासिक वेंकट भवन भी अकाल के दौर में रोजगार उपलब्ध कराने की पहल से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इसके निर्माण कार्य से जरूरतमंद लोगों को मजदूरी का अवसर मिला। इस भवन का निर्माण 1908 में पूरा होने का उल्लेख मिलता है।
पुस्तकालय और अखबार की दुनिया से भी जुड़ा नाम
महाराजा वेंकटरमण सिंह के शासनकाल की एक कम चर्चित उपलब्धि सरस्वती भंडार पुस्तकालय की स्थापना मानी जाती है। इसके अलावा वर्ष 1902 में दरबार प्रेस की स्थापना और उससे ‘भारत भ्राता’ समाचार पत्र के प्रकाशन का उल्लेख मिलता है। यह पहल बताती है कि उस दौर में रीवा रियासत में पुस्तकों, लेखन और समाचारों के प्रसार के लिए भी संस्थागत प्रयास किए जा रहे थे।
बाघों के शिकार पर प्रतिबंध का उल्लेख
रीवा के इतिहास से जुड़े कुछ अध्ययन महाराजा वेंकटरमण सिंह के शासनकाल में बाघों के शिकार पर प्रतिबंध लगाने का उल्लेख करते हैं। यह तथ्य इसलिए दिलचस्प है, क्योंकि रीवा और आसपास का विंध्य क्षेत्र लंबे समय से बाघों के लिए प्रसिद्ध रहा है। हालांकि, प्रतिबंध कब लगाया गया और वह किस सीमा तक लागू था, इसकी पुष्टि के लिए मूल राजकीय अभिलेखों का अध्ययन आवश्यक है।
इतिहास में दर्ज एक अलग पहचान
महाराजा वेंकटरमण सिंह का शासनकाल 1918 तक रहा। उनके दौर की अकाल राहत नीति, पुस्तकालय, दरबार प्रेस और वेंकट भवन जैसी विरासतें रीवा के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनके जीवन से जुड़ी ये जानकारियां बताती हैं कि किसी रियासत का इतिहास केवल युद्धों और राजसी वैभव से नहीं बनता, बल्कि संकट के समय लिए गए फैसलों और संस्थाओं के निर्माण से भी उसकी पहचान तय होती है।


