स्वामी रामकृष्ण परमहंस की भक्ति कोई साधारण पूजा नहीं थी, वह एक पागलपन (दिव्य उन्माद)था। जहाँ उनके जीवन की सबसे मर्मस्पर्शी कहानी उनके ‘साक्षात्कार’ की है।
वही जब रामकृष्ण के बड़े भाई की मृत्यु हुई, तो दक्षिणेश्वर मंदिर की जिम्मेदारी उन पर आ गई। वे माँ काली की प्रतिमा को केवल पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि अपनी जीती-जागती माँ मानते थे। वे अक्सर मूर्ति के सामने बैठकर उनसे बातें करते थे “माँ, तू मुझे दिखती क्यों नहीं? क्या यह सब झूठा है? क्या तू सिर्फ मिट्टी और पत्थर है?”
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कुछ दिन बीतते गए और उनकी व्याकुलता बढ़ती गई। वे खाना-पीना और सोना भूल गए। वे मंदिर के पास के जंगल में रात भर बैठे रोते रहते। वही लोग उन्हें ‘पागल’ कहने लगे। एक दिन सूर्यास्त के समय, जब मंदिर में आरती की घंटियाँ बज रही थीं, रामकृष्ण जी मंदिर के गर्भगृह में गए।
वे माँ की प्रतिमा के सामने खड़े होकर चीखने लगे थे
“माँ! एक दिन और बीत गया और तूने दर्शन नहीं दिए। अब यह जीवन और नहीं सहा जाता!”
इस विरह की अग्नि इतनी तीव्र थी कि उन्होंने मंदिर की दीवार पर टंगी हुई ‘बलि देने वाली तलवार’ (खड्ग) उठा ली। वे अपना सिर काटने ही वाले थे तभी अचानक पूरा कमरा एक अलौकिक प्रकाश से भर गया। वह प्रकाश इतना तेज था कि मंदिर की दीवारें, छत और प्रतिमा सब गायब हो गए।
जहाँ रामकृष्ण जी ने बाद में बताया था”मैंने देखा कि प्रकाश का एक अनंत समुद्र मेरी ओर बढ़ रहा है। वह लहरें इतनी शक्तिशाली थीं कि उन्होंने मुझे डुबो दिया। उस प्रकाश के बीच में मैंने अपनी आनंदमयी माँ को देखा। उसके बाद मुझे सुध-बुध नहीं रही।”
वही जब उन्हें होश आया, तो उनके मुंह से केवल एक ही शब्द निकल रहा था— “माँ… माँ…”। इसके बाद उनकी भक्ति और बढ़ गई। वे माँ को अपने हाथ से खाना खिलाते, कभी उनके गोद में सो जाते और कभी उनके साथ घंटों बातें करते। वे कहते थे कि माँ काली उनके साथ वैसे ही रहती हैं जैसे एक माँ अपने छोटे बच्चे के साथ रहती है।
