मां दुर्गा को युद्ध की देवी क्यों कहा जाने लगा, जाने इसका रहस्य

मनोज शुक्ला सम्पादक

Editor | Updated: 20 Oct 2026, 05:43 AM IST | 1 min read
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महिषासुर मर्दनी माँ दुर्गा की यह कथा केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह परम चेतना और शक्ति द्वारा अधर्म के विनाश का जीवंत प्रतीक है।

पौराणिक काल में, रंभ नाम के असुर को महिष (भैंसे) के रूप में जन्मा एक अत्यंत शक्तिशाली पुत्र हुआ, जिसका नाम महिषासुर था। वह स्वभाव से अत्यंत क्रूर और महत्वाकांक्षी था। उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की।
जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए, तो महिषासुर ने अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। तब महिषासुर ने चालाकी से वरदान मांगा:
“प्रभु! मेरी मृत्यु किसी देवता, असुर या मानव के हाथों न हो। यदि मेरी मृत्यु हो, तो केवल किसी ‘नारी’ के हाथों हो।”
महिषासुर का मानना था कि एक अत्यंत कोमल और निर्बल स्त्री उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। वरदान मिलते ही उसका अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया।

वरदान के नशे में चूर महिषासुर ने तीनों लोकों पर आक्रमण कर दिया। उसने पाताल लोक और पृथ्वी पर कब्ज़ा जमाया और फिर अपनी विशाल सेना के साथ स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी। देवताओं और महिषासुर की सेना के बीच सौ वर्षों तक भयंकर युद्ध चला। महिषासुर की मायावी शक्तियों के आगे देवता टिक नहीं पाए। उसने इंद्रदेव को हराकर स्वर्ग का सिंहासन छीन लिया और स्वयं ‘इंद्र’ बन बैठा।
सभी देवता अपनी जान बचाकर त्रिमूर्ति—भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महादेव की शरण में पहुंचे और महिषासुर के अत्याचारों का वृत्तांत सुनाया।

देवताओं की दुर्दशा सुनकर भगवान विष्णु और शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उस तीव्र क्रोध के कारण तीनों देवों और अन्य देवताओं के मुख से एक अद्भुत और दिव्य तेज (प्रकाश) प्रकट हुआ। वह तेज इतना विशाल था कि उसने पूरे ब्रह्मांड को आलोकित कर दिया।
सभी देवताओं का वह सम्मिलित तेज मिलकर एक अत्यंत सुंदर और अठारह भुजाओं वाली देवी के रूप में परिवर्तित हो गया। वे ही माँ दुर्गा (आदिशक्ति) थीं।
इसके बाद सभी देवताओं ने देवी को अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र सौंपे:
• भगवान शिव ने अपना त्रिशूल दिया।
• भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र सौंपा।
• इंद्रदेव ने अपना वज्र और ऐरावत हाथी का घंटा दिया।
• अग्निदेव ने शक्ति, यमराज ने कालदंड और समुद्रदेव ने कभी न मुरझाने वाली माला और दिव्य वस्त्र भेंट किए।
• हिमालय राज ने माँ को सवारी के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली और गर्जना करने वाला सिंह (शेर) दिया।

अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर माँ दुर्गा ने इतनी जोर से अट्टहास और शंखनाद किया कि तीनों लोक कांप उठे। इस भयंकर गर्जना को सुनकर महिषासुर ने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया।
जब महिषासुर के सेनापतियों (चिक्षुर, चामर, उदग्र, और महाहनु) ने देवी को देखा, तो वे उन पर टूट पड़े। लेकिन माँ दुर्गा के सामने कोई टिक नहीं सका। माँ ने खेल ही खेल में करोड़ों असुरों का संहार कर दिया। उनके सिंह ने भी अपनी दहाड़ से शत्रुओं के प्राण सूत लिए।

जब महिषासुर ने देखा कि उसकी सेना नष्ट हो रही है, तो वह स्वयं युद्ध के मैदान में उतरा। वह अपनी मायावी शक्तियों से पल-पल में रूप बदलने लगा:
1. पहले वह एक भैंसे (महिष) के रूप में आया और अपने खुरों से धरती को चीरने लगा। माँ ने उस पर अस्त्रों की वर्षा की।
2. फिर वह सिंह बन गया। जैसे ही माँ ने उसकी गर्दन काटने की कोशिश की, वह पुरुष के रूप में तलवार लेकर सामने आ गया।
3. तुरंत बाद वह एक विशाल हाथी बन गया और अपनी सूंड से माँ के सिंह को खींचने लगा। माँ ने अपनी तलवार से उसकी सूंड काट दी।
4. अंत में, वह फिर से अपने मूल भैंसे के रूप में लौट आया और पहाड़ों को उठाकर देवी पर फेंकने लगा।
माँ दुर्गा ने मधुर हास्य बिखेरते हुए सोमरस का पान किया और कहा—”मूर्ख! जब तक मैं इस रस का पान करती हूँ, तब तक तू जितना गरजना है गरज ले। इसके बाद तेरा वध निश्चित है।”
यह कहकर माँ दुर्गा ने छलांग लगाई और महिषासुर के ऊपर चढ़ गईं। उन्होंने अपने पैरों से महिषासुर की गर्दन को दबाया और अपने तीक्ष्ण त्रिशूल से उसकी छाती पर प्रहार कर दिया। जैसे ही महिषासुर के मुख से उसका असली असुर रूप आधा बाहर निकला, माँ दुर्गा ने अपनी तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

महिषासुर के मरते ही आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। देवताओं ने माँ की स्तुति की और उन्हें ‘महिषासुर मर्दनी’ (महिषासुर का मर्दन करने वाली) के नाम से पुकारा।
यह युद्ध पूरे 9 दिनों तक चला था और दसवें दिन (दशमी) माँ को विजय प्राप्त हुई। इसी पावन स्मृति में हर साल नवरात्रि और दसवें दिन विजयादशमी (दशहरा) का त्योहार मनाया जाता है, जो हमें यह सिखाता है कि अहंकार और अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में जीत हमेशा सत्य और धर्म की ही होती है।