सीधी के बघोर में हजारों साल पुरानी आस्था के निशान! पत्थरों में छिपा है शक्ति उपासना का रहस्य..
पुरापाषाण कालीन स्थल पर मिला गोलाकार पत्थर मंच और त्रिकोणीय शिलाखंड, आज भी ‘माई’ के रूप में पूजे जाते हैं ऐसे पत्थर; संरक्षण और ऐतिहासिक पहचान को लेकर उठे सवाल
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खास रिपोर्ट | वरिष्ठ राजू गुप्ता, पत्रकार, सीधी
सीधी। मध्य प्रदेश के सीधी जिले की धरती अपने भीतर हजारों वर्षों का इतिहास समेटे हुए है। विंध्य पर्वतमाला की तलहटी और सोन घाटी के आसपास फैले प्राचीन पुरातात्विक स्थलों में शामिल बघोर गांव का पुरापाषाण कालीन स्थल आज भी इतिहास, पुरातत्व और स्थानीय आस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है। यहां मिले पत्थरों से निर्मित गोलाकार मंच और उसके केंद्र में प्राप्त विशिष्ट त्रिकोणीय बलुआ पत्थर ने शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया है। इस संरचना को कुछ पुरातत्वविदों ने मातृदेवी अथवा शक्ति उपासना से संबंधित संभावित प्राचीन पूजा स्थल के रूप में व्याख्यायित किया है।
करीब 11 हजार वर्ष या उससे भी अधिक प्राचीन माने जाने वाले इस स्थल की विशेषता केवल इसके पुरातात्विक अवशेष नहीं हैं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में आज भी प्रचलित पत्थरों की पूजा की परंपरा भी है। हालांकि, इस स्थल को विश्व में मूर्ति पूजा अथवा देवी आराधना का सर्वाधिक प्राचीन प्रमाण घोषित करने के लिए ठोस और आधिकारिक ऐतिहासिक पुष्टि आवश्यक है।

1980 में हुई खुदाई ने खींचा था शोधकर्ताओं का ध्यान
बघोर के पुरातात्विक महत्व को समझने के लिए वर्ष 1980 और उसके बाद हुए उत्खनन का उल्लेख आवश्यक है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.आर. शर्मा तथा अमेरिकी पुरातत्वविद् जे. डेसमंड क्लार्क के निर्देशन में संबंधित शोधकर्ताओं की टीम ने यहां खुदाई की थी। इस शोध से जुड़े विद्वानों में जे.एम. केनोयर और जे.एन. पाल भी शामिल थे।
उत्खनन के दौरान पत्थरों से बना एक गोलाकार, नीचा मंच सामने आया। उसके केंद्र में प्राकृतिक रूप से त्रिकोणीय आकार का एक बलुआ पत्थर मिला, जिसकी सतह पर रंगीन संकेंद्रित परतें दिखाई देती थीं। शोध विवरणों के अनुसार, यह पत्थर कई टुकड़ों में टूटा हुआ था, जिन्हें जोड़कर उसके मूल स्वरूप का अध्ययन किया गया।
इस संरचना के आसपास पत्थर के औजार और उनके निर्माण से संबंधित अवशेष भी मिले। ये साक्ष्य इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक मानव की गतिविधियों और उसकी जीवनशैली को समझने में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
शोधकर्ताओं ने स्थानीय क्षेत्रों में प्रचलित देवी पूजा की परंपराओं से इस संरचना की तुलना करते हुए इसे संभावित प्राचीन शक्ति उपासना स्थल माना। हालांकि, इस व्याख्या को लेकर अकादमिक जगत में सावधानी भी बरती गई है, क्योंकि किसी पुरातात्विक संरचना का धार्मिक उद्देश्य केवल उसके आकार और आधुनिक परंपराओं से समानता के आधार पर निर्णायक रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता।
त्रिकोणीय पत्थर में छिपा है आस्था और इतिहास का अनूठा संबंध
बघोर स्थल से प्राप्त त्रिकोणीय शिलाखंड अपनी विशिष्ट बनावट के कारण विशेष महत्व रखता है। इसकी प्राकृतिक परतें और ज्यामितीय स्वरूप इसे अन्य सामान्य पत्थरों से अलग पहचान देते हैं।
कुछ शोधकर्ताओं ने इस पत्थर और उसके आसपास की संरचना को मातृदेवी की उपासना से जोड़कर देखा है। उनके अध्ययन में वर्तमान समय में प्रचलित स्थानीय देवी पूजा और प्राचीन संरचना के बीच समानताओं को महत्वपूर्ण माना गया।
हालांकि, इस शिलाखंड को आधुनिक काली यंत्र या श्री यंत्र का हूबहू प्राचीन रूप कहना प्रमाणित निष्कर्ष नहीं है। इसी तरह, इसके आधार पर वर्तमान सनातन धार्मिक परंपराओं और पुरापाषाण कालीन समुदायों के बीच सीधे, अखंड संबंध का दावा करने के लिए भी अतिरिक्त प्रमाणों की आवश्यकता है।
इतिहास की दृष्टि से इस स्थल का महत्व इस बात में है कि यहां मानव की प्रागैतिहासिक गतिविधियों के साथ संभावित प्रतीकात्मक अथवा अनुष्ठानिक व्यवहार के संकेत भी मिलते हैं।
आज भी ‘माई’ के नाम से होती है पूजा-अर्चना
बघोर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में पत्थरों को देवी स्वरूप मानकर पूजा करने की परंपरा स्थानीय आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताई जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, नीम के पेड़ों के नीचे अथवा खुले स्थानों पर स्थापित त्रिकोणीय और विशिष्ट आकार के पत्थरों को ‘माई’ के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय मान्यताओं में केराई, कालिका और बघोर काली जैसे नामों का उल्लेख भी मिलता है।
ग्रामीणों का कहना है कि उनके बुजुर्गों के समय से ही यहां पूजा-अर्चना होती आ रही है। कई लोगों का मानना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों से चली आ रही है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका निर्वहन किया जा रहा है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु यहां मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। मन्नत पूरी होने पर कुछ लोग भंडारे का आयोजन करते हैं। नवरात्र के अवसर पर यहां मेला लगने की बात भी ग्रामीणों द्वारा बताई जाती है।
यहां की आस्था में आदिवासी समुदायों, विशेषकर कोल और बैगा समाज, तथा अन्य ग्रामीण परिवारों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है। हालांकि, वर्तमान पूजा परंपरा और प्राचीन पुरातात्विक संरचना के बीच वास्तविक ऐतिहासिक निरंतरता की पुष्टि के लिए व्यवस्थित नृवंशशास्त्रीय और पुरातात्विक अध्ययन आवश्यक है।
ग्रामीणों का दावा—पूर्वजों से देखते आ रहे हैं पूजा की परंपरा
जब इस स्थल के संबंध में स्थानीय लोगों से चर्चा की गई, तो ग्रामीणों ने बताया कि वे अपने बचपन से यहां पूजा-अर्चना होते देखते आ रहे हैं। उनके बुजुर्ग भी बताते थे कि इस क्षेत्र में प्राचीन अवशेष मिले थे, जिनमें से कुछ को पुरातत्व विभाग अपने साथ ले गया था।
ग्रामीणों के अनुसार, वर्तमान में भी कुछ अवशेष यहां मौजूद हैं, जिनकी पूजा ग्रामवासी करते हैं। कुछ ग्रामीणों ने चबूतरे का निर्माण कर वहां मूर्ति स्थापित किए जाने की जानकारी भी दी। उनका कहना है कि प्राचीन अवशेषों के प्रति श्रद्धा आज भी बनी हुई है और स्थानीय लोग उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानते हैं।
हालांकि, पुरातत्व विभाग द्वारा किन अवशेषों को कब और कहां ले जाया गया, वर्तमान में वे किस संग्रहालय अथवा संस्थान में सुरक्षित हैं और स्थल पर मौजूद वस्तुओं की आधिकारिक पहचान क्या है—इन प्रश्नों की पुष्टि संबंधित विभाग के अभिलेखों से किया जाना आवश्यक है।
पहाड़ की तलहटी में बसा स्थल, प्रकृति और परंपरा का अद्भुत संगम
बघोर का यह क्षेत्र प्राकृतिक परिवेश और स्थानीय धार्मिक परंपराओं के कारण भी विशिष्ट दिखाई देता है। पहाड़ के किनारे स्थित पूजा स्थल, पत्थरों से निर्मित संरचनाएं और ग्रामीणों की श्रद्धा यहां पहुंचने वाले लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनते हैं।
स्थल का अवलोकन करने पर प्राचीन इतिहास और वर्तमान जनजीवन के बीच एक दिलचस्प संबंध दिखाई देता है। एक ओर पुरातात्विक अवशेष इस क्षेत्र में हजारों वर्ष पूर्व मानव की उपस्थिति और गतिविधियों की जानकारी देते हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय पूजा परंपराएं इस स्थान के वर्तमान सांस्कृतिक महत्व को सामने लाती हैं।
हमारी टीम जब इस क्षेत्र में पहुंची, तो यहां ऐसे कई दृश्य देखने को मिले, जिन्होंने इस स्थल के इतिहास, स्थानीय मान्यताओं और संरक्षण की आवश्यकता को लेकर अनेक सवाल खड़े किए।
बड़ा सवाल—इतिहास की इस विरासत को उचित पहचान कब मिलेगी?
बघोर जैसे पुरातात्विक स्थलों का महत्व केवल स्थानीय धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। ये स्थल मानव सभ्यता, प्राचीन जीवनशैली, प्रतीकात्मक व्यवहार और सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस स्थल का वर्तमान में विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया गया है? क्या यहां मिले अवशेषों की सूची, उनकी आयु निर्धारण संबंधी रिपोर्ट और संरक्षण की स्थिति सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है? क्या स्थल की ऐतिहासिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे उचित पहचान दिलाने के लिए कोई ठोस योजना बनाई गई है?
इन सवालों के जवाब पुरातत्व विभाग, संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों और इतिहास के विशेषज्ञों के माध्यम से ही सामने आ सकते हैं। यदि यहां मौजूद अवशेषों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, वैज्ञानिक परीक्षण और संरक्षण किया जाए, तो यह स्थल सीधी जिले की ऐतिहासिक विरासत को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
आस्था अपनी जगह, वैज्ञानिक पुष्टि भी जरूरी
बघोर की पहचान स्थानीय लोगों के लिए श्रद्धा और विश्वास से जुड़ी हुई है। ग्रामीणों की मान्यता है कि सच्चे मन से देवी की आराधना करने पर उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी विश्वास के चलते लोग यहां पूजा-अर्चना करते हैं और मन्नत पूरी होने पर धार्मिक आयोजन करते हैं।
दूसरी ओर, पुरातात्विक दृष्टि से इस स्थल की प्राचीनता, संरचना के उद्देश्य और धार्मिक उपयोग को लेकर निष्कर्ष वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित होने चाहिए। वर्ष 1983 में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका Antiquity में प्रकाशित अध्ययन ने बघोर की संरचना को संभावित पुरापाषाण कालीन शक्ति उपासना स्थल के रूप में प्रस्तुत किया था। यह अध्ययन आज भी इस विषय पर चर्चा का महत्वपूर्ण आधार है।
बघोर की यह विरासत इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और प्रशासन के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है। जरूरत इस बात की है कि स्थानीय आस्था का सम्मान करते हुए उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों का निष्पक्ष परीक्षण किया जाए और इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या सीधी जिले के बघोर गांव की इस प्राचीन विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर वह पहचान और संरक्षण मिल पाएगा, जिसकी वह हकदार हो सकती है?
खास रिपोर्ट: वरिष्ठ राजू गुप्ता, पत्रकार, सीधी



