दो पहाड़ चढ़कर माता कोटमहिंन के दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु, मन्नते पूरी होने की मान्यता

अमित श्रीवास्तव

Reporter | Updated: 18 Oct 2026, 12:09 PM IST | 1 min read
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# दो पहाड़ चढ़कर माता कोटमहिन के दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु, मनोकामनाएं पूरी होने की है मान्यता

**संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र में पहाड़ों के बीच विराजमान हैं प्राचीन देवी; नवरात्रि में उमड़ती है भक्तों की भीड़, आदिवासी समाज में विशेष आस्था**

**कुसमी, सीधी।** शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर सीधी जिले के संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र अंतर्गत कोटमा पहाड़ पर विराजमान माता कोटमहिन के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। माता के दर्शन करने के लिए भक्तों को पहाड़ी रास्तों से होकर एक नहीं, बल्कि दो पहाड़ चढ़ने पड़ते हैं। कठिन रास्तों और दुर्गम चट्टानों के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था कम नहीं होती। भक्त माता के दरबार में ज्वारा चढ़ाने, मनोकामनाएं मांगने और मन्नत पूरी होने पर पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के बीच माता कोटमहिन की महिमा और प्राचीन मान्यताओं को लेकर गहरी आस्था है।

### चट्टानों और गुफा के बीच माता का प्राचीन धाम

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, माता कोटमहिन का निवास प्राचीन काल से पहाड़ के भीतर चट्टानों के बीच रहा है। लोगों का कहना है कि पहले यहां गुफानुमा स्थान था, लेकिन समय के साथ बड़े-बड़े पत्थरों के आ जाने से गुफा का रास्ता काफी हद तक बंद हो गया। इसके बावजूद कुछ श्रद्धालु चट्टानों के नीचे बने संकरे रास्तों से भीतर तक पहुंचकर दर्शन करने का प्रयास करते हैं, जबकि अनेक भक्त बाहर से ही माता को चुनरी, फल, नारियल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।

### दो अलग-अलग पहाड़ी रास्तों से पहुंचते हैं भक्त

माता कोटमहिन के दर्शन के लिए श्रद्धालु कोड़ार ग्राम पंचायत की ओर से पहाड़ी रास्ता पार करते हुए पहुंचते हैं। वहीं, दूसरा रास्ता रौहाल ग्राम पंचायत की ओर से कोटमा पहाड़ चढ़कर आगे दूसरे पहाड़ तक जाता है। दोनों ही रास्ते दुर्गम हैं, लेकिन नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु कठिन चढ़ाई पार कर माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी भक्त माता के दर्शन करने आते हैं।

### आदिवासी समाज के हर घर में माता का चौरा होने की मान्यता

आदिवासी समाज में माता कोटमहिन के प्रति विशेष श्रद्धा देखने को मिलती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र के अनेक आदिवासी परिवारों के घरों में माता का चौरा स्थापित है, जहां नवरात्रि के दौरान नारियल, धूप-अगरबत्ती और पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। समाज के लोग माता को अपने गांव, परिवार और क्षेत्र की रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजते हैं।

### बैगा निभाते हैं परंपरागत पूजा और सेवा की जिम्मेदारी

आदिवासी परंपरा में गांव के बैगा की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बैगा गांव की सुख-शांति, सुरक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े कार्यों में अपनी भूमिका निभाते हैं। जब गांव में महामारी या छोटी-बड़ी बीमारियां फैलने की आशंका होती है, तब ग्रामीण माता कोटमहिन की पूजा-अर्चना कर उनसे गांव की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि पारंपरिक पूजा-पद्धतियों और धार्मिक अनुष्ठानों से उन्हें मानसिक संबल मिलता है और गांव में सुख-शांति बनी रहती है।

### शैला-कर्मा नृत्य से भी जुड़ी हैं लोकमान्यताएं

माता कोटमहिन से जुड़ी कई लोककथाएं आदिवासी समाज में प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, पुराने समय में जब गांवों में शैला और कर्मा नृत्य का आयोजन होता था, तब देवी के आगमन से जुड़ी मान्यताएं भी प्रचलित थीं। कहा जाता है कि माता भेष बदलकर इन आयोजनों में शामिल होती थीं और ग्रामीणों के साथ नृत्य करती थीं। इन कथाओं को आज भी समाज के बुजुर्ग श्रद्धा और विश्वास के साथ सुनाते हैं।

### नवरात्रि में ज्वारा, खप्पर नृत्य और पारंपरिक अनुष्ठान

नवरात्रि के दौरान क्षेत्र के गांवों में ज्वारा बोने और माता की विशेष पूजा करने की परंपरा निभाई जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, विसर्जन के दिन कुछ गांवों में भगत पारंपरिक खप्पर लेकर नृत्य करते हैं और घर-घर जाकर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। इस दौरान ग्रामीण बड़ी श्रद्धा के साथ माता की आराधना करते हैं। कुसमी क्षेत्र के आसपास के गांवों में भी इन परंपराओं की झलक देखने को मिलती है।

स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि पारंपरिक मंत्रों, झाड़-फूंक और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से बीमारियों तथा परेशानियों से राहत मिलने की मान्यता है। हालांकि, ये धार्मिक और पारंपरिक विश्वास हैं; बीमारी की स्थिति में चिकित्सकीय उपचार भी आवश्यक है।

### जनप्रतिनिधि भी पहुंचते हैं माता के दरबार

नवरात्रि के दौरान क्षेत्र के कई जनप्रतिनिधि और आदिवासी समाज के प्रमुख लोग भी माता कोटमहिन के दर्शन करने पहुंचते हैं। इनमें क्षेत्रीय विधायक कुंवर सिंह टेकाम, जनपद अध्यक्ष श्यामवती सिंह, जिला पंचायत सदस्य हीराबाई सिंह, पूर्व मंडल अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह और मंडल अध्यक्ष अखंड प्रताप सिंह सहित अन्य लोगों के नाम बताए जाते हैं। श्रद्धालुओं के अनुसार, जनप्रतिनिधि भी माता के दर्शन, पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं।

### मन्नत पूरी होने की मान्यता से बढ़ रही श्रद्धालुओं की आस्था

स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता कोटमहिन के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं। मनोकामना पूरी होने पर भक्त दोबारा माता के दर्शन करने पहुंचते हैं और नारियल, चुनरी तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं। इसी मान्यता और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के चलते माता कोटमहिन के प्रति लोगों की आस्था लगातार बनी हुई है।

नवरात्रि के दिनों में पहाड़ों की कठिन चढ़ाई, चट्टानों के बीच स्थित प्राचीन धाम और आदिवासी समाज की पारंपरिक पूजा-पद्धतियां माता कोटमहिन के धार्मिक महत्व को दर्शाती हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान केवल दर्शन का केंद्र नहीं, बल्कि उनकी लोकसंस्कृति, परंपरा और गहरी आस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण धाम है।

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