उमरिया तपस गुप्ता (7999276090)
जिले में रेत का कारोबार आखिर किसके भरोसे चल रहा है|नियमों के भरोसे, जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी में या फिर ठेका कंपनी की अपनी व्यवस्था के सहारे। कोतवाली थाना क्षेत्र के चपहा में रेत परिवहन को लेकर हुए विवाद ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है। NH-43 के पास रेत ठेका कंपनी बाबा महाका’ की निगरानी चौकी होने की बात सामने आई है। शिकायतकर्ता सुमित राय का आरोप है कि उन्होंने 21 अक्टूबर 2026 को शिकायत देकर कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
Also Read
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब NH-43 से जिले के जिम्मेदार अधिकारी और खनिज विभाग के अधिकारी गुजरते हैं, तो क्या उनकी नजर इस निगरानी चौकी पर नहीं पड़ी? यदि चौकी लंबे समय से संचालित थी, तो उसकी वैधानिक स्थिति की जांच पहले क्यों नहीं हुई। और यदि अधिकारियों को इसकी जानकारी थी, तो अब तक क्या कदम उठाए गए। इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है।
सड़क किनारे चौकी, फिर अधिकारियों की नजर क्यों नहीं
NH-43 जिले का प्रमुख मार्ग है। इस मार्ग से सरकारी अधिकारियों और संबंधित विभागों के वाहनों की आवाजाही होती रहती है। ऐसे में चपहा में कंपनी की निगरानी चौकी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या अधिकारियों ने कभी यह जानने की कोशिश की कि चौकी किस अनुमति के आधार पर संचालित हो रही है।वहां तैनात कर्मचारियों की जिम्मेदारी क्या है और उन्हें कौन-कौन से अधिकार दिए गए हैं।
यदि चौकी की वैधानिक स्थिति स्पष्ट नहीं थी, तो इसकी जांच समय रहते क्यों नहीं हुई।क्या संबंधित विभाग ने कभी निरीक्षण किया।इन सवालों का उत्तर जिला खनिज अधिकारी और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को देना चाहिए।
बाबा महाकाल रेत कंपनी पर उठे सवाल, अब खनिज विभाग की परीक्षा! चपहा की चौकी का हिसाब कौन देगा
कोतवाली थाना प्रभारी मदनलाल मरावी के अनुसार, चपहा में रेत परिवहन को लेकर विवाद हुआ है और दोनों पक्षों की शिकायतें प्राप्त हुई हैं। मामले की जांच जारी है। उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी की ओर से बनाई गई निगरानी चौकी का सरकारी कागजों में पंजीयन नहीं है।
यह बयान चौकी की वैधानिक स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि, पंजीयन नहीं होने की जानकारी मात्र से किसी कानूनी उल्लंघन का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। संबंधित अनुमति, लागू नियम और चौकी के संचालन की वास्तविक स्थिति की जांच आवश्यक है।
लेकिन सवाल यह जरूर है कि यदि चौकी के संचालन में किसी अनुमति या नियम का उल्लंघन हुआ है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। कंपनी की, निगरानी करने वाले विभाग की या उन अधिकारियों की जिन्होंने समय रहते इसकी जांच नहीं की।
क्या अधिकारियों की अनदेखी से बढ़ा कंपनी का हौसला
चपहा में विवाद के दौरान कुछ लोगों के हाथों में डंडे दिखाई देने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि और उसमें शामिल लोगों की भूमिका की जांच अभी जरूरी है। किसी भी कंपनी के कर्मचारी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। यदि जांच में मारपीट, धमकी या अन्य अपराध की पुष्टि होती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन इस मामले में सवाल सिर्फ विवाद करने वालों तक सीमित नहीं है। यदि NH-43 के पास निगरानी चौकी संचालित हो रही थी, तो उसकी वैधानिक स्थिति की जांच की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की भी बनती है। क्या विभाग की निगरानी प्रभावी थी| क्या कंपनी की गतिविधियों का सत्यापन किया गया। क्या अधिकारियों की कथित अनदेखी ने ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा दिया। इन प्रश्नों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
जिला खनिज अधिकारी से जवाब मांग रहे सवाल
जिला खनिज अधिकारी को स्पष्ट करना चाहिए कि चौकी की जानकारी विभाग को थी या नहीं। यदि जानकारी थी, तो उसकी अनुमति और संचालन की जांच कब की गई।यदि जानकारी नहीं थी, तो NH-43 जैसे प्रमुख मार्ग के पास संचालित व्यवस्था विभाग की निगरानी से कैसे छूट गई।
सुमित राय का कहना है कि शिकायत देने के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस को शिकायत पर की गई कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, जबकि खनिज विभाग को चौकी की वैधानिक स्थिति और अपनी निगरानी व्यवस्था पर जवाब देना चाहिए।
फिलहाल किसी अधिकारी की मिलीभगत या संरक्षण का प्रमाण सामने नहीं है। लेकिन उठे सवालों का जवाब तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर देना जरूरी है। चपहा का मामला प्रशासनिक निगरानी की परीक्षा है। जनता जानना चाहती है कि रेत का कारोबार नियमों से चलेगा या सवाल उठने के बाद भी जिम्मेदार विभाग केवल जांच का भरोसा देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेंगे।



